“छोटे कपड़े नहीं, छोटी सोच होती है” यह बात कितनी सही है ?

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कुछ दिन पहले मुझे कोरा पर किसी ने यह  सवाल पूछा “छोटे कपड़े नहीं, छोटी सोच होती है” क्या आप इससे सहमत हैं? इस विषय पर अपने विचार रखिए।


सवाल से तो सीधे सीधे पता चलता है के यहां पर लड़कियों के कपडे और लड़को  सोच के बारे में सवाल खड़ा किया जा रहा है।  और इस बात की जोरों शोरों से उम्मीद की जा रही है के लडकों के सोच को छोटा कहकर जवाब दिए जाएंगे। और शायद लडको की साइड लेने वाले को गालियां  पड़  सकती है, इसलिए मैंने जवाब के शुरुआत में ही मेरे डर  को सामने रखकर जवाब  शुरुआत की जो इस तरह है...  

मेरा जवाब :


इस जवाब पर शायद मुझे कुछ लोगो से गालिया पड़ सकती है,



1. डार्विन के थ्योरी को जानने और मानने के वालो के लिए बहुत सिंपल लॉजिक है, अविकसित आदिमानव बगैर कपड़ों के घूमता था। जब थोड़ा विकास हुआ और उसे कुछ अक्ल आयी तो कम से कम कमर को छुपाने लग गया।  जैसे जैसे वह मॉडर्न होता गया उतने कपडे पहनता चला गया। और यह विकास कुछ सदियों पहले रुक गया। अब लोगो की अक्ल फिर कम होने लग गयी और साथ साथ कपडे भी।
मानव जाति का विकास और कपड़े

इस हिसाब से कपड़ो से मानव जाती के विकास के स्तिथि का आकलन किया जा सकता है। जो पूर्ण रूप से ढका हुआ है वह मॉडर्न और विकसित है बाकी का आप खुद ही समझ सकते है । 

ईसाई, यहूदी  और इस्लामी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार..  जब आदम (Adam) और हव्वा (Eve) से गलती हुई तो सबसे पहली सजा उन्हें दी गयी उसमे एक यह थी की उनके कपडे / लिबास छीन लिया गया।  इस वजह से उन्होंने बहुत शर्मिंदा महसूस किया। इस से बचने केलिए वह दोनों दरख़्त के पत्तो से अपने बदन को छुपाने लगे हालाकि आपस में मियांबीवी थे।  इस हिसाब से तो जितने कपडे जिस्म पर होंगे इंसान ही शर्म और हया वाला समझना चाहिए। और कपड़ो का उतरना इंसान की बेइज्जती।

2. अगर किसी को लड़कियों के छोटे कपड़ों को पूरीतरह जायज बताना है तो उसे  मर्दो के सोचपर सवाल नहीं उठाना चाहिए, क्योंकि वह मर्द अक्सरियत में उसका बाप, भाई और शुभचिंतक ही हो सकता है भला कोई बाप अपने बेटी को छोटे कपड़ो को लेकर डांटता है तो क्या वह छोटी सोंच का हो गया ? वह तो हर हाल में उसका भला सोचता है । छोटे कपड़ों को बेहिचक जायज ठहराने वाली सोच भी छोटी सी है ।


3. रही बात मर्दों के गंदे और छोटी सोच की तो वह पूर्ण ढके हुए बदन पर भी हवस की निगाह डाल ही देती है । उसे शायद ही बदन के ढके हुए होने से कोई फर्क पड़ता होगा। इसके लिए बेशक समाज और मूल्यों की दुर्दशा जिम्मेदार है।

4. अगर आप परस्त्री को माता या बहन समान देखोगे तो आप उस की और अपने नज़रो की जरूर हिफाज़त करेंगे, चाहे वह नर्वस्त्र क्यों ना आप के सामने आ जाए । इसके लिए चाहिए अनुकूल संस्कार और समाज का माहौल ।  भला अधूरे कपडे पहनकर मर्दो को उकसाते फिरने वाली बालाये और उन्हें गन्दी नज़र से ताड़ने वाले अपने बच्चो को ऐसे संस्कार कैसे दे पाएंगे ?

और मानव विकास का उदाहरण पसंद नहीं आया होगा तो इस बात को नोट कीजिये : यह उदाहरण मैंने नहीं बनाया इसे एक नौजवान लड़की ने एक भर सभा को सम्भोदित करते हुए दिया था।
जवाब अच्छा लगे तो अप वोट कर देना।

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